क्या मुर्दे भी कभी कुछ सोचते हैं

ना मैं कुछ देख सकता हूँ
ना सुन सकता हूँ
और ना ही मैं कुछ
बोल सकता हूँ

मैं नहीं जानना चाहता
क्या हो रहा है मेरे आसपास
कौन जिन्दा है
और कौन मर रहा

मैं तो मशगूल हूँ बस
अपनी ही दुनिया में
और घुल रहा हूँ अपनी
रोटी-रोजी की चिंता में

मुझमें नहीं है क्षमता
सोचने, समझने
और कुछ भी
बूझने की

सोचने समझने का काम
तो इंसान करते हैं
और मुझे लगता है कि
मैं इंसान ही नहीं रहा

मैं तो बन गया हूँ बस
एक चलता-फिरता मुर्दा
और तुम ही कहो
क्या मुर्दे भी कभी कुछ सोचते हैं

लोधी डॉ. आशा ‘अदिति’
भोपाल

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like Comment 0
Views 148

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share