क्या भाग रहे हैं शब्द

“क्या भाग रहे हैं शब्द”

यूँ तो शब्द कभी नहीं भागते किंतु वर्तमान समय में प्रचलित फिल्मी गीतों, फिल्मी कहानीयों और उनके डायलॉग सुनो तो ऐसा लगता है कि मानो किसी लेखक के शब्दकोश से शब्द भाग रहे हों और उन्होंने जल्दी-जल्दी उन्हे पकड़ कर उटपटांग ढंग से जमा बिना सोचे समझे एक मोटे से लिफाफे के बदले में समाज रूपी नदी मे प्रवाहित कर दिया।
वर्तमान समय में फिल्मों के माध्यम से समाज में जो गंदगी फैलाई जा रही है यह एक बड़ा विषय है और इस पर विचार करने की आवश्यकता है।
हो सकता है कि मेरी इस बात को सिरे से नकार दिया जाए और यह कह दिया जाए कि यह एक गंभीर विषय नहीं है । किंतु हम इस बात को कभी अस्वीकार नहीं कर सकते कि आज फिल्मी गीतों, फिल्मी कहानियों, फिल्मों के नाम और उनके डायलॉग से समाज में वह अश्लीलता व अभद्रता परोसी जा रही है जो हमारी युवा पीढ़ी एवं किशोर वर्ग पर गलत प्रभाव डाल रही है। हम इसे किसी भी तरह के ग्रेड में बाटकर नहीं देख सकते। यदि आप यह कहते हैं कि यह फिल्म किशोरों के लिए नहीं है। तब मैं पूछना चाहता हूँ कि क्या एैसा कह देने अथवा लिख देने से आपने उन्हें यह फिल्म देखने से रोक लिया।
एक ओर तो आप कहते हैं कि किसी बच्चे को दिखाया अथवा सुनाया जाने वाला गलत शब्द भी उसका उसका लैंगिक शोषण की श्रेणी में आता है और इस पर कानूनी कार्यवाही का भी नियम है। तो क्या सड़कों पर लगे फिल्मों के पोस्टर जिनमें अधिक से अधिक अश्लीलता दिखाने की होड लगी है वह इस दायरे से मुक्त हैं? क्या गली के किसी एक घर में जोरो से बजने वाला गाना गली के अन्य कानों तक नहीं पहुंचता है? क्या सड़कों से गुजरते समय सड़क किनारे की दुकानों से आने वाले गीतों की आवाज, उनके वह शब्द जो आपत्तिजनक होते हैं उन कानों तक नहीं पहुंचते हैं जो उन रास्तों से होकर अपने स्कूल जाते हैं?
और यदि वे शब्द उन कानों तक जाते हैं तो क्या वह गलत नहीं है।
वर्तमान समय में फिल्मी या उस तरह के गीतों में प्राय यह देखने को मिलता है कि उनके शब्दों में फूहड़ता तथा अश्लीलता होती है। जब विरोध होता है तो कुछ दिनों तक गानों के वह शब्द एक ध्वनी के आगोश में छुपा दिए जाते हैं। किन्तु कुछ दिनों के बाद वह पुन: वह जैसे के वैसे ही हो हैं। ठीक इसी तरह का हाल फिल्मों की कहानियों में भी है। जहाँ बात क्वालिटी की नहीं क्वांटिटि की होती है ।
क्यों आज फिल्मों में गंदा से गंदा लिखने की होड़ लगी है? क्या लेखकों के शब्दकोश से अच्छे शब्द लुप्त हो गए हैं? या हमने अपनी कलम को चंद मोटे लिफाफे में बेंच दिया है? वह फिल्मी दुनिया जो कभी मनोरंजन के लिए बनी थी अच्छाई के प्रसार के लिए बनी थी । वह आज इस तरह देश की आम जनता से छल कर रही है उसे मनोरंजन के नाम पर यह सब दे रही है। कभी किसी समाज को लेकर, कभी किसी प्रांत को लेकर, कभी किसी धर्म को तो कभी ईश्वर को लेकर सवाल उठाया जाता है और विरोध भी होता है। विरोध होना भी चाहिए। किंतु क्या इस बात का विरोध नहीं होना चाहिए कि गीतों में अभद्रता है या फिल्मों के पोस्टरों से अश्लीलता बह रही है।
जब जब मैं इस विषय पर विचार करता हूँ कि गलती कहाँ से हो रही है तो मुझे मेरे निजी अनुभव पर लगता है और मेरा निजी विचार है कि गलती उस लेखक की सबसे अधिक है जिसने वह गीत वो कहानी, वो डायलॉग लिखा जिससे समाज के किसी भी वर्ग पर और खास तौर पर किशोर वर्ग पर जो कि इस देश का आने वाला भविष्य है । उस पर गलत प्रभाव पड़ता है ।
हमारी लेखनी का उद्देश्य समाज को अच्छाई बांटना होना चाहिए क्योंकि समाज में अच्छाई का प्रचार-प्रसार ही लेखनी का धर्म है। हम कुछ जगहों पर कड़वी सच्चाई लिख सकते हैं किंतु अभद्रता और अश्लीलता हमारी लेखनी से नहीं आनी चाहिए ।
लेखन के क्षेत्र से जुड़े हुए लोगों का उद्देश्य अच्छा लिखना होना चाहिए अच्छा बिकना नहीं ।
लेकिन जब इस तरह का दौर चलता ही चला जा रहा है। तब मैं उस प्रश्न के साथ समाप्त करता हूँ ”क्या भाग रहे हैं शब्द?”

भवानी प्रताप सिंह ठाकुर
संपर्क – 8989100111
ईमेल- thakurbhawani66@gmail.com

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