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"क्या खोया क्या पाया "

ये कविता करोना काल को देखते हुए लिखी है। एक सकारात्मक सोच, स्वास्थ्य वृद्धि में सहायक होती है l शीर्षक है..

” क्या खोया, क्या पाया ”

हम कहाँ थे ,और आज कहाँ आ गए
हम चले थे, आधुनिकता की ओर
लेकिन ,पुरातन ने हमें फिर से बुलाया।

सच में , सोचो जरा ….
हमने क्या खोया, क्या पाया ?

खोने को हमारे पास, था भी क्या ?
इक तन, जो नश्वर है
चंद साँसे, जो उधारी हैं l

पाने को हमने, बहुत पाया
अपनों का साथ , मित्रों से बात
खान पान का ज्ञान
योग ने बनाया महान
संस्कृति का आभास
आध्यात्म का विकास l

सच में, सोचो जरा…
हम कहाँ थे, और आज कहाँ आ गए
हमने क्या खोया और क्या “नहीं” पाया ?

वैशाली रस्तौगी
दिनांक 2 नवंबर 2020

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Vaishali Rastogi
Vaishali Rastogi
SAMBHAL. MORADABAD
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मुझे हिंदी में काफी रूचि है. विदेश में रहते हुए हिन्दी तथा अध्यात्म की तरफ...
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