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हर साँझ सुरमई है

बसंत कुमार शर्मा

बसंत कुमार शर्मा

गज़ल/गीतिका

March 18, 2017

हर भोर है सुहानी, हर साँझ सुरमयी है
जब से मिले हैं तुमसे, चेहरे पे हर ख़ुशी है

गुलशन में’ ही मगन है, चाहत नहीं गगन की
इक फूल से मुहब्बत, तितली को’ जो हुई है

कब से सुनी नहीं हैं, कोयल की’ मीठी’ बोली
हर डाल आम की अब, सबसे ये पूछती है

कालीन की जरूरत, मुझको नहीं यहाँ पर
आँगन की घास मेरी, उतनी ही मखमली है

इंसानियत अगर हो, हर आदमी के’ अन्दर
कोई नहीं पराया, कोई न अजनबी है

हर एक आदमी बस, ये सीख ले तो’ अच्छा
क्या क्या गलत यहाँ है, क्या क्या यहाँ सही है

Author
बसंत कुमार शर्मा
भारतीय रेल यातायात सेवा (IRTS) में , जबलपुर, पश्चिम मध्य रेल पर उप मुख्य परिचालन प्रबंधक के पद पर कार्यरत, गीत, गजल/गीतिका, दोहे, लघुकथा एवं व्यंग्य लेखन
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