क्या क्या ढूढ़ता हूँ

किताबों को पढ़ना छोड ही दिया है,
टीवी के चेनलों मे शुंकु ढूढ़ता हूँ।
मैं आदमी नासमझ हूँ जो,
फरेबी दुनिया मे यंकी ढूढ़ता हूँ।
उम्रभर नजर आसमा पे रखी,
आखरी समय दो गज जमी ढूढ़ता हूँ।
किसी को कभी मै हंसा ना सका,
खुदगर्ज़ अपने लिए हँसी ढूढ़ता हूँ।
माँ को छोड़ आया था रोते हुए,
अब फोटो में उसकी खुशी ढूढ़ता हूँ।
शियासत की गर्मी में सूखे रिश्ते हमारे,
उन्ही में मोहब्बत की नमी ढूढ़ता हूँ।
माँगता करोडों मैं भगवान से,
चढ़ाने के लिए जेब में चवन्नी ढूढ़ता हूँ।
रचनाकार:~ जितेंन्द्र दीक्षित,
पड़ाव मंदिर साईंखेड़ा।
+91 99753 87778.

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