कविता · Reading time: 1 minute

कौन हो तुम

कौन हो तुम जो चुपके से
अंदर चले आ रहे हो
कौन हो तुम जो बिन आहट
अन्तस मैं दस्तक दे रहे हो
फूल मुरझा कर बिखर चुके
हरियाली का निशाँ तक नहीं
ये स्याह सी काली रातें
गम और दर्द से भरे दिन
कौन हो तुम जो इस निर्जन में
उम्मीद बाँधे आ रहे हो
कौन हो तुम जो इत्मीनान से
बिखरे पन्ने फ़िर से समेट रहे हो
छपा है क्या अब भी इनमें कुछ
बचा है क्या अब भी कुछ
किन रास्तों को पार कर
अजनबी तुम यहाँ तक आ गये
पैरों के निशां तक तो मिटा दिये थे
परछाई भी साथ छोड़ चुकी
फिर कैसे तुम इस वीरान बंजर में
तुम क्यों आ गये
कौन हो तुम? कौन हो तुम?

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