कौन कहता कि स्वाधीन निज देश है?

कौन कहता कि स्वाधीन निज देश है?
कोख पर नग्नता नाचती ठेश है |

बद् कुपोषण-अशिक्षा का अंधा चलन|
सह रहा अब भी नर,व्याधि-पीड़ा -जलन|
बढ़ रहा, भ्रष्टतारूपी मल-बदचलन|
हाय ! क्षरती मनुजता दिखे क्लेश है |
कौन कहता कि स्वाधीन निज देश है ?

सिसकियाँ पायीं, भोजन नहीं पेट पर|
युवतियाँ बिक रही, दोष किसका रे नर |
बन गए हम,शवों का उभरता नगर|
जन्म धरती वृथा ग्लानि-परिवेश है|
कौन कहता कि स्वाधीन निज देश है?

दिव्य सत् को ही कम कर रहे आप-हम|
मैला संसार ढो ,जर रहे आप-हम|
नाव अवगुण की खे, डर रहे आप-हम|
मर गई चेतना, द्वंद-गम शेष है|
कौेन कहता कि स्वाधीन निज देश है?

जागरण का जो नायक है वह ईश है|
बोध बिन ही तो जन,हीनता -शीष है|
आचरण का जो दीपक है, वह बीस है|
सोया तो डूबती नाव-सम रेष है|
कौन कहता कि स्वाधीन निज देश है?
कोख पर नग्नता नाचती ठेस है|

………………..
कोख=गर्भाशय
रेष=क्षति,हानि
………………..

बृजेश कुमार नायक
“जागा हिंदुस्तान चाहिए”एवं “क्रौंच सुऋषि आलोक” कृतियों के प्रणेता

उक्त रचना /गीत ,जे एम डी पब्लिकेशन नई दिल्ली द्वारा वर्ष 2016 में प्रकाशित कृति/संकलन
“भारत के प्रतिभाशाली हिंदी रचनाकार” में प्रकाशित हो चुकी/चुका है|

23-12-2016को पोस्ट उक्त गीत मेरे फेसबुक पेज
” Brijesh nayak की रचनाएं” में भी पढा जा सकता है |

बृजेश कुमार नायक
“जागा हिंदुस्तान चाहिए” एवं “क्रौंच सुऋषि आलोक” कृतियों के प्रणेता

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