गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

कौन अरबी फ़ारसी पढ़ कर कभी शायर हुआ

कौन अरबी फ़ारसी पढ़कर कभी शायर हुआ
इश्क़ ने जिसको रुलाया बस वही शायर हुआ

आज भी उन गेसुओं में है गुलाबों की महक
काट कर साये में जिनकी जिन्दगी शायर हुआ

हो गया जिस रोज़ उनका वस्ल मुझको ख़्वाब में
छा गई मुझ पर उसी दिन बेखुदी शायर हुआ

हर्फ़ केसर जाफ़रानी सी ग़ज़ल महके न जो
फिर ज़माने के लिये तू ख़ाक ही शायर हुआ

यूँ तुनक कर बैठ जाना बज़्म में अच्छा नहीं
मान मत ऐसे बुरा तू तो अभी शायर हुआ

कल किताबों में पढ़ेंगे लोग तेरी दास्तां
तब कहेंगे वाह गुलशन क्या सही शायर हुआ

राकेश दुबे “गुलशन”
20/07/2016
बरेली

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