कोरोना

नाव जीवन की डगमग बहे रात दिन,
भय का सागर हमेशा डराता रहा।
वेदना से ग्रसित देह देखीं सभी,
आँसुओं को मगर क्यों छिपाता रहा ?

हो रहा नित मुखर कष्ट देखो जरा,
साँस लाखों की विष में यहाँ पल रहीं ।
भूल की एक ने पर भुगत सब रहे,
रोज लाशें चिता पर यहाँ जल रहीं ।
व्योम पर छा रहा है अँधेरा घना,
श्राप जीवन को प्रतिदिन रुलाता रहा ।।

काल विध्वंस करता चला जा रहा,
अश्रु, भय के सिवा शेष कुछ भी नहीं ।
शोर सिमटा पड़ा चुप्पियों में अभी,
व्याधि की मिल न पाई दवाई कहीं ।
हर नगर गाँव सूना पड़ा देख ले,
दूरियाँ परिजनों में बढ़ाता रहा ।।

देख परिणाम कुदरत से विद्रोह का,
मृत्यु का नित्य अनुपात बढ़ने लगा ।
रोक दो प्रभु भयावह प्रलय ज्वार को,
चक्र जीवन का देखो ये थमने लगा ।
श्रेष्ठता, लोभ, लालच में फँसकर सदा,
एक दूजे को मानव सताता रहा ।।

✍️ अरविन्द त्रिवेदी
महम्मदाबाद
उन्नाव उ० प्र०

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