Dec 20, 2020 · कविता
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कोरोना

तू आयेगा इसी उम्मीद में, मैं हर रोज जीता हूँ,
जहर घोली हवा को, यूँ ही घुट- घुट के पीता हूँ,
जवानी क्या, बुढापा क्या, अब बे-रंगीन है दुनिया,
कोरोना काल में अब तो, सब बरबाद है दुनिया,
तरीके हर तरफ बचने की खातिर, लाख खोजा है,
मगर हम उन तरीकों में भी, नहीं महफ़ूज होते हैं,
बहुत उम्मीद है तुमसे, कि अब तुम जल्द आओगे,
दहशत भरी इस जिन्दगी को, तुम बचाओगे,
बड़ी उम्मीद में, आशा से, अपलक यूँ ही बैठे हैं,
कि तुम अब जल्द आ जाओ, निराशा दूर कर जाओ,
नहीं तो जल्द ही दुनिया में, मातम का शमा होगा,
न होगा आदमीं , न तो धराभोगी कोई होगा।।
(कोरोना वैक्सीन का इंतजार)
डाॅ धनुर्धर द्विवेदी

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Dhanurdhar Dwivedi
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