कोरोना दूर भगाएँ हम

घर में होकर कुछ काम करें हम नव जीवन प्रदान करें हम
कभी राष्ट्र पे आक्रान्ताओं का अतुलित भीषण शासन था,
ना खेतों के थे अधिकारी हम ना अन्न हमारा राशन था,
नदी पोखर ना अपने थे औ नमक पे अधिकार नहीं,
जब छीन गई थी आजादी जब रातें थीं स्वीकार नहीं,
तब कितने हीं वीरों ने इस भारत पे जान गवाएं थे,
भगत , सावरकर वीरों ने भारत पे प्राण लुटाए थे,
उस आजादी का अबतक क्या तुमने इस्तेमाल किया?
जो वीर मरे उनपे हँसते हँसते हीं बस यूँ साल किया।
ना वीरों के उन बलिदानी का कोई मोल चुकाते थे,
ये मिली तुझे थी आजादी जो यूँ हीं ढोल बजाते थे,
जो भी चाहे वो खाते हो, जो भी चाहे गा जाते हो,
कि रातों को चलना फिरना कि ऐसे माँग सुनते हो।
कोका कोला पिज्जा बर्गर कि सारे तुमको भाते हैं,
कमर हिलाता अभिनेता मन मस्तिष्क पर छा जाते हैं,
बस कंक्रीटों के शहर बने औ यहाँ धुआँ है मचा शोर,
कि गंगा यमुना काली है यहाँ भीड़ है वहाँ की दौड़।
ना खुद पे कोई शासन है ना मन पे कोई जोर चले,
जंगल जंगल कट जाते हैं जाने कैसी ये दौड़ चले।
जब तुमने धरती माता के आँचल को बर्बाद किया,
तभी कोरोना आया है धरती माँ ने ईजाद किया।
कोरोना अब आजादी का देखो मोल बताता है,
गली गली हर शहर शहर कोरोना ढ़ोल बजाता है।
हमको तुमको घर में रखकर धरती की लाज बचाता है,
पशु पंछी से जो छीने हैं वो सबको आज लौटाता है।
कोरोना तुझसे तुमपे हीं थोड़ा सा शासन चाहे,
ढीला मन तूने छोड़ दिया थोड़ा प्रसाशन चाहे।
कुछ दिवस निरंतर घर में हीं होकर खुद को आबाद करो,
निज बंधन हीं श्रेयकर है ना खुद को तुम बर्बाद करो।
आओ हम सब घर में होकर हीं निज धर्म निभाएँ हम,
मोल आजादी चुका चुकाकर कोरोना भगाएँ हम।

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