Dec 17, 2020 · कविता
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” “कोरोना” को तो हरगिज़ है अब ख़त्म होना”

कितने मजबूर, बेबस, बशर हो गए,
कितने क़ुर्बाँ, कोरोना-क़हर हो गए।

चीन से चलके आया, जो इक वायरस,
सारी दुनिया मेँ, इसके चलन हो गए।

साँस लेना मरीज़ों का, दूभर हुआ,
अल्मते-नौ, तबीबे-नज़र हो गए।

रोग था एक हरगिज़, नया रूबरू,
दाँ-ए-साइन्स, भौचक, दहर हो गए।

था दवाओं का, दिखता नहीं कुछ असर,
सब थे टीके के बस, मुन्तज़र हो गए।

मास्क सँग, हाथ धोना, रिवायत बनी,
जलसा-ओ-रौनक़ोँ को, अहद हो गए।

क़ुर्बतेँ यूँ भी रिश्तों मेँ, नापैद थीं,
फ़ासले, और भी अब, अहम हो गए।

कितने मोहताज-ए-रोज़ी-रोटी हुए,
कितने मजदूर थे, दर-ब-दर हो गए।

ख़त्म होना “कोरोना” को हरगिज़ है अब,
सब्रो-ईमाँ के, हम पे, करम हो गए।

अब तो ईजाद, वैक्सीन भी हो गई,
दीप “आशा” के जल, मोतबर हो गए..!

बशर # व्यक्ति,persons
अल्मते-नौ # नये लक्षण,new symptoms
तबीबे-नज़र # चिकित्सकोँ को दिखना,to be visible to doctors
दाँ-ए-साइन्स # वैज्ञानिकगण, scientists
दहर # सँसार(मेँ),(in the) world
मुन्तज़र # प्रतीक्षारत, waiting for
रिवायत # रिवाज, custom
अहद # एक लम्बा अन्तराल,a long interval
क़ुर्बतेँ # नज़दीकियाँ, closeness
नापैद # अप्राप्य, विलुप्तप्राय, non-existent, lost etc.
ईजाद # आविष्कार, invention
मोतबर # विश्वसनीय, reliable

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रचयिता-

Dr.asha kumar rastogi
M.D.(Medicine),DTCD
Ex.Senior Consultant Physician,district hospital, Moradabad.
Presently working as Consultant Physician and Cardiologist,sri Dwarika hospital,near sbi Muhamdi,dist Lakhimpur kheri U.P. 262804 M.9415559964

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