Jan 3, 2021 · कविता
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कोरोना को और न ढोना

कोरोना को और न ढोना
कोरोना का अनजाना भय,बिगाड़ रहा था जीवन की लय।
हवाई जहाज़ों की उड़ी हवाइयाँ,असंख्य लोगों की बंद हुई कमाइयाँ ।
कोरोना ने क्या दिन दिखलाए, नाक-मुँह बंद करा दिया,
कभी न रुकने वाले विश्व को,पूरे साल आराम करा दिया।
आया है ये झौंका,देने हमें भीतर झाँकने का मौक़ा ,
संभाल अ बंधु डोल रही है जीवन नौका।
इंसान को भूख है बहुत पाने की, पशु-पक्षियों के हिस्से का भी खाने की।
अरे, बंधु खा जितना पचा पाए,वरना विनाश से तुझे न कोई बचा पाए।
खाने-पीने पर लगाओ रोक,शौक़ में दुनियाँ को न जहन्नुम में झोंक।
कोरोना जैसे और भी देख रहे हैं बाट,जो कर देंगे मानव की खड़ी खाट।
लालच से न नाता जोड़,मोह को छोड़, वास्तविकता से नाता जोड़।
नया साल नई सोच,फिर न करे कोई ऐसी जानलेवा खोज।
न दोहराए मानव ये भूल,घायल न कर पाए फिर कोरोना सा कोई शूल।
कोरोना के पैर नहीं हैं ,हमारे सहारे बढ़ता है।
हमारी थोड़ी दूरी से देखो ,पल में ये कैसे घटता है।
जो जहाँ था वहाँ रह गया,मुश्किल से हर कोई ये ग़म सह गया।
रिश्तों की ये एक नई मिसाल है,इक दूजे के बनें सब ढाल हैं।
नव वर्ष की आहट ने भरा उत्साह ,जागी आस , छूटी पुराने वर्ष में आह।
आओ अपने पर संयम रखें,दिलों की नज़दीकी तन की दूरी रखें।
इम्तिहान है ये सबका,डर मत बंधु है सब पर हाथ रब का।
इंदु नांदल
03.01.2021
जकारता
इंडोनेशिया

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Indu Nandal
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पाँच साल तक All India Radio के युवा संसार प्रोग्राम में स्वरचित कविताएँ बोलने के... View full profile
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