Sep 28, 2020 · लघु कथा
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कोरोना की वैक्सीन

कोरोना की इस महामारी ने जिंदगी में ,और जो बदलाव किए हैं, उसके साथ तो किसी तरह एक सामंजस्य बैठ चुका है,

पर इंसानी रिश्ते, कहीं एक घुटन, तड़प और खिन्नता का शिकार हो रहे हैं।
सामाजिक दूरी की मजबूरी , गर्मजोशी और नैसर्गिक समीपता की अभिव्यक्तियों के भी आड़े आ रही है।

मेरे मित्र, एक प्रतिष्ठित संस्थान के फैक्ट्री मैनेजर हैं , कोरोना के इस संकट के समय भी, उनको प्रायः रोज ही काम पर निकलना पड़ता है,

सतर्कता का पालन करते हुए, रोज का दिन एक जंग जैसा ही होता है।

काम से लौट कर घर पर अपनों से दूरी बनाए रखने की मजबूरी, इस त्रासदी ने ला खड़ी की है।

अपने इकलौते दस वर्षीय बेटे से भी थोड़ी दूरी बनाकर रखते हैं, रात में अलग कमरे में सोते है।
मासूम बचपन पिता की गोद में जाने को तरसता रहता है और एक पिता भी तो बच्चे को अपने अंक में भरना चाहता है।

एक दिन जब उनसे रहा नहीं गया, तो अपने सोते हुए बेटे की पीठ को प्यार से हल्के हल्के सहलाने लगे, ये सोच कर कि वो जाग न जाए।

पुत्र हाथों का स्पर्श महसूस होते ही, नींद से जाग पड़ा,

पिता के पास जाने की बेचैनी सोई नहीं थी, वो बिना पलक झपकाए जाग रही थी और इस पल की प्रतीक्षा में ही बैठी थी, उसने चिपक कर मासूमियत से पूछा, पापा कोरोना की वैक्सीन आ गयी है क्या?

पिता से सुन रखा था कि वैक्सीन आते ही सब कुछ फिर पहले जैसा हो जाएगा।

एक दूसरे की धड़कनों को सुनते, इस सुकून के बीच, कोरोना का भय आज कुछ पलों के लिए थोड़ा दूर जरूर जा बैठा है,

कल फिर एक लक्ष्मण रेखा खींच देगा उन दोनों के बीच।

ये अन्तहीन और निष्ठुर इंतजार के पल आखिर कब तक!!!

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Umesh Kumar Sharma
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पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट हूँ। अपने इर्द गिर्द जो कुछ देखता या महसूस करता हूँ... View full profile
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