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कोरोना और चुनाव

कोरोना भी अजब गजब है, न मास्क से न ही सेंनेटाईजर से डरता है । वैक्सीन भी शीघ्र असरकारक नहीं है, वैक्सीन के दोनों डोज लगने के बाद भी लोगों को कोरोना हो रहा है, मतलब सीधा सा है वैक्सीन लगवाने के बाद भी कम से कम छः सात हफ्ते तक सावधानी जरुरी है, तभी कोरोना से बचा जा सकता है। लेकिन कोरोना केवल एक ही चीज से डरता है, वो है “चुनाव” ।
जिस राज्य में चुनाव होगे वहां कोरोना किसी को नहीं होता। सभी पार्टियां चुनाव प्रचार एवं रैलियों में व्यस्त हो जाती है , केन्द्र सरकार और चुनाव आयोग अपनी आंखें बंद कर तमाशा देखा करते है। लोगों के हित से क्या लेना देना उन्हें तो अपना काम करने से मतलब है फिर चाहे उन राज्यों में कोरोना विस्फोट हो जाए ।
कोरोना फैला हुआ है फिर भी सत्ता धारी हो या विपक्ष पार्टी हर कोई अपनी रैली, रोड़ शो , एवं प्रचार प्रसार में लगी हुई हैं, कोई सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क, सेंनेटाईजर इत्यादी का ध्यान नहीं रखता, उन्हें जनता के स्वास्थ से कोई मतलब नहीं उन्हें तो केवल अपनी चुनावी जीत से मतलब है ।
आजकल कोरोना की दूसरी लहर भी जोर पर है, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों में फिर से लाकडाउन की शुरूआत हो गई है, परंतु आश्चर्य की बात तो यह है कि केरल जहां से देश में कोरोना का पहला केस मिला था एवं बाद में भी विकराल रूप से फैला था, एवं पं.बंगाल जिसका जनसंख्या घनत्व बहुत अधिक है, तमिलनाडु, पुडुचेरी, एवं असम यह ऐसे पांच राज्य है, जहां अप्रैल एवं मई माह में चुनाव है । क्या इन राज्यों ने वाकई कोरोना को हरा दिया है ?या कोई और राज है , मीडिया भी इन राज्यों के कोरोना अपडेट को नहीं बताती कि इन राज्यों में कोरोनो किस रफ्तार के साथ फैल रहा है, मीडिया तो केवल चुनावी सभाओं एवं तिल का ताड़ और राई का पहाड़ बनाने के साथ साथ मन के लड्डू खिलाने वाले चुनावों वादों को दिखाने में व्यस्त है, मीडिया भी अब जनता की हितैशी दिखाई नहीं पड़ती ।
जिन राज्यों में चुनाव नहीं हैं उन राज्यों में कोरोना दुगनी – चौगुनी रफ्तार के साथ फैल रहा है, मास्क एवं सोशल डिस्टेंसिंग अनिवार्य है, कहीं कहीं फिर से लाकडाउन लगाया जा रहा है, पालन न करने पर जुर्माना या सजा अथवा दोनों हो सकते है । धारा 188 ( इसके अंतर्गत लाकडाउन का पालन न करने पर सीधे जेल भेजने का प्रावधान है ) लगी हुई है ।
लेकिन क्या ये नियम चुनावी राज्यों के लिए नहीं हैं ? क्या वास्तव में चुनावी राज्यों में कोरोना नहीं है या आंकडों को छुपाया जा रहा है । चुनाव आयोग को इस बात पर जरूर ध्यान देना चाहिए साथ ही महामहिम सुप्रीम कोर्ट को भी इस बात को संज्ञान में जरुर लेना चाहिए एवं केन्द्र सरकार को कोरोना गाइडलाइन का चुनावी राज्यों सहित सभी राज्यों को सख्ती के साथ पालन करने का निर्देश देना चाहिए ।
चुनाव आते ही “कोरोना” चुनावी ऐरिया से भाग जाता है या सरकार नजर अंदाज करती है, ये तो कोरोना जाने या फिर सरकार, बेचारा आम आदमी क्या जाने ? 🤭🤭

डां. अखिलेश बघेल
दतिया ( म.प्र.)

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B.A.M.S., M.A., M.PHIL(HINDI) याद कर तेरा चेहरा रात कट जाती है, तू नहीं आती मगर तेरी याद आती है । तेरी याद आते ही मेरी जान जाती है, तड़पता हूं…
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