कोटा का विलाप

कोटा का विलाप

जब स्व के अतृप्त अधूरे
सपनों को तुम्हारी
माँ की कोख में रोपा था,
तब कहीं जाकर के
तुम्हारा निश्छल सुकोमल
मुखड़ा देखा था.

परवरिश के धागों में
गुंथी स्वर व्यंजन की माला
ढाई वर्ष में ही तुम्हे पहनाई,
जिस उम्र में तुलसी के राम और
सूर के श्याम घुटनों के बल
नाप नहीं पाते थे पूरी अँगनाई.

स्वयं को जिन्दा रखने की
इंसानी प्रवृत्ति सदियों से रही है,
हजारों संतानों के शरीर में
बाप की आत्मा पुरातन से पल रही है.

परशुराम से लेकर
आमिर के दंगल तक,
सन्तानें ढोती हैं
थोपा हुआ भविष्य
आज की सभ्यता से
आदिम जंगल तक.

प्रिय ! मैंने आई आई टी और
पी एम् टी के शामियाने से
तुम्हारा सारा आकाश ढक दिया है
तुम्हारी आकाशगंगा में
गणित, भौतिकी, जीव और रसायन है,
तुम क्या जानो कि इससे परे भी
सप्तर्षि, ध्रुव और पुच्छल तारों का भी
कोई वातायन है.

तुम्हारा बचपन, खेलकूद, शरारतें सभी को
हर्फ़ दर हर्फ़ किताबों में दफ़न कर दिया,
सिर्फ यही नहीं, अपनी सभी ख्वाहिशों को
लोन, एडवांस, उधार से भर लिया.

जवानी में दाढ़ी-मूँछे, कद-काठी
और खुराक बढती है
लेकिन तुम्हारा बढ़ा
बोर्ड और चश्मे का नंबर,
कक्षा प्रथम से अब तक निरंतर.

तुम्हारी क्षमताओं,
इच्छाओं को सुने, परखे बिना
तुम्हारे मन मस्तिष्क के श्यामपट पे
मैंने जो भी कथित सपनों को उकेरा है,
प्रिय संतति ! तुम्हारे मन की बात नहीं
वह सबकुछ मेरा है, मेरा है, मेरा है.

तुम्हारा सुकोमल, सम्बलहीन मन
नहीं सह पाया हारने के दबाव को,
जूझते पिता के अभाव को.
तुम नितांत एकाकी, टूटे, बिखर गए,
और, हारने के बाद वाली
जीत से मुकर गए .

तुम कटआफ और नंबर की दौड़ में
कोल्हू के बैल हो गए,
किन्तु दुनियादारी की परीक्षा में
प्रिय तुम फेल हो गए.

वाकई, नहीं दे पाया मैं तुम्हें सबक
भय, हताशा, निराशा से उबरने का,
धैर्य, साहस, जोखिम, आशा से पूरित
जीवन को सँवरने का.

हे कोटा की आत्महत्याओं !
सुनो, मैं ही तुम्हारा गुनहगार हूँ,
क्योंकि मैं भी पिता हूँ और
परकाया प्रवेश की
मानसिकता का शिकार हूँ.

प्रदीप तिवारी ‘धवल’
Raghvendu1288@gmail.com
(कोटा राजस्थान में कोचिंग के लिए जाना जाता है )

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