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हुस्न को गुरुर किस बात का है,

विनोद कुमार दवे

विनोद कुमार दवे

गज़ल/गीतिका

January 7, 2017

हुस्न को गुरुर किस बात का है,
ये चाँद भी बस रात का है।
*** ***
ये पतझड़ तो मौसम,
अश्क़ों की बरसात का है।
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वो बरसों से खामोश है,
ये भी तरीका इंतकाम का है।
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हमें बदनाम करने वाले,
तू भी शख़्स किस काम का है।
*** ***
‘दवे’ उसे पूछना जरूर,
मुद्दा क्या तेरी औकात का है।
*** ***
उसे नफ़रत है तो कहती क्यों नहीं,
प्यार भी खेल जज़्बात का है।
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Author
विनोद कुमार दवे
परिचय - जन्म: १४ नवम्बर १९९० शिक्षा= स्नातकोत्तर (भौतिक विज्ञान एवम् हिंदी), नेट, बी.एड. साहित्य जगत में नव प्रवेश। पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।अंतर्जाल पर विभिन्न वेब पत्रिकाओं पर निरन्तर सक्रिय। 4 साझा संकलन प्रकाशित एवं 17 साझा संकलन प्रकाशन... Read more
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