कोई पास आया सवेरे-सवेरे

मुझे आ जगाया सवेरे-सवेरे
कोई पास आया सवेरे-सवेरे

सजा सेज कलियाँ लगीं गुदगुदाने
हिया से लगाया सवेरे-सवेरे

बतायें क्या तुमको कयामत क्या आयी
लबों पर सजाया सवेरे-सवेरे

छुआ जब किसी ने मेरे गुलबदन को
क्या मन्ज़र दिखाया सवेरे-सवेरे

नजर से नजर जब मिलाई थी उसने
नशा सा पिलाया सवेरे-सवेरे

चुराकर जिया जब वो जाने लगा था
घटा बनके छाया सवेरे-सवेरे

मैं मदहोश होकर लगी झूमने जब
आ खुद में समाया सवेरे-सवेरे

न जाने क्यूँ माही चढ़ी ये ख़ुमारी
कदम डगमगाया सवेरे-सवेरे

©® डॉ प्रतिभा माही

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पाँच तत्व से है बना, मेरा सुन्दर रूप । मैं तो हूँ एक आत्मा, बिंदी...
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