गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

कोई दीवार तो ढूढ….

रोने की बात पर कहकहा लगा भाई
समय के साथ ही निशाना लगा भाई
तबीयत पूछता है कौन बीमार की
टिफिन है सामने खाना लगा भाई
नदारद हुए किसी पे अब यकींन के दिन
कोई सूरत फिर भरोसा लगा भाई
जिदों से चल नहीं पाती कभी दुनिया
किनारे करीब चल नौका लगा भाई
मचाये रहती है जो पेट में खलबली
सभी बातों बहस-छौका लगा भाई
कोई दीवार ढूढ ‘सुशील’कद माफिक
मुझे दीवार फिर ज़िंदा लगा भाई

सुशील यादव

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