गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

कोई तुझ सा नहीं….

कोई तुझसा नहीं —

तू इस-सा,उस-सा,किसी-सा नहीं
तू बस तुझ-सा,कोई तुझ-सा नहीं

बड़ी अनोखी संरचना प्रकृति की
कोई दिखता यहाँ, किसी-सा नहीं

गढ़ा है विलक्षण कुदरत ने सबको
वो तुझ-सा नहीं, तू उस-सा नहीं

नकल करे फिर क्यों तू किसी की
बन सकता जब तू किसी-सा नहीं

जगा स्वत्व और जान तू निज को
सोच ले मन में कोई मुझ सा नहीं

कम न आँक किसी से तू खुद को
कर सके काम कोई तुझ-सा नहीं

तू है अनूठा, तुझ-सा है बस तू ही
किसी और संग तेरा हिस्सा नहीं

जो बदा है किस्मत में ‘सीमा’ तेरी
वो नियति तेरी, कोई किस्सा नहीं

– सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद
“चाहत चकोर की” से

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