कोई उम्मीद नहीं रही

देख तेरे तेवर अब कोई उम्मीद नहीं रही,
सच कहूं आज से मैं तेरी मुरीद नहीं रही।

पहले लड़ लेती थी मैं जमाने से तेरे लिए,
लेकिन अब वो पहले जैसी जिद नहीं रही।

हर रोज लिख लिख कर भेजती थी चिट्ठी,
संभाल कर रखती थी, वो रसीद नहीं रही।

ए सनम! तुझसे ही रौशन होती थी रातें मेरी,
लेकिन पहले जैसी अब दीवाली ईद नहीं रही।

छाई रहती थी एक खुमारी मुझ पर इश्क की,
खुदा जाने क्यों पहले जैसी ताकीद नहीं रही।

इससे बड़ी कोई बात नहीं हो सकती मेरे लिए,
गुरु जी बोले सुलक्षणा जैसी शागिर्द नहीं रही।

©® डॉ सुलक्षणा

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