“कैसे लिखूँ मैं”

कैसे लिखूँ मैं…कैसे लिखूँ मैं…
मन में है कोहराम मचा।
कैसे लिखूँ मैं…कैसे लिखूँ मैं…

इतनी बेशर्मी अत्याचार बढ़ा
कुंठित मन और दूषित भुजा।
कैसे लिखूँ मैं…कैसे लिखूँ मैं…
मन में है हाहाकार मचा।

कैसे लिखूँ मैं इतिहास भला
जब वर्तमान का दम है घुटा।
कैसे लिखूँ मैं…कैसे लिखूँ मैं…
मन में है अंगार बड़ा।

कैसे लिखूँ मैं शहीद-कथा
जब आँखों में हो धुआँ- धुँआ।
कैसे लिखूँ मैं…कैसे लिखूँ मैं…
मन में है भूचाल मचा।

कैसे लिखूँ मैं बातें सीमाओं की
जब घर में ही हो दुश्मन भला।
कैसे लिखूँ मैं…कैसे लिखूँ मैं…
मन में है तूफान बड़ा।

मौन – विवश का अर्थ नहीं अब
स्वाभिमान कहता है जागो।
वीरों के इस देश को कैसी जंग लगी
कि हर शख्स यहाँ है ठगा खड़ा।

कैसे लिखूँ मैं…कैसे लिखूँ मैं…
कैसे लिखूँ मैं…कैसे लिखूँ मैं…
©निधि…

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"हूँ सरल ,किंतु सरल नहीं जान लेना मुझको, हूँ एक धारा-अविरल,किंतु रोक लेना मुझको" View full profile
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