कविता · Reading time: 2 minutes

कृष्ण चालीसा

मेरे प्रिय मित्रों और विद्वत जनों को सोनू हंस का प्रणाम। मैं आपके समक्ष अपने प्यारे कान्हा की स्वरचित #चालीसा# रख रहा हूँ। आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

हे माधव देवकीसुत, कृष्ण करो कल्याण।
हरो विपदा गिरिधारी, अपना बालक जान॥

मैं मूढ़ अज्ञानी नाथ, श्री चरणों में आज।
भव बंधन काटो मोहि, राखो मोरी लाज॥

मथुरा जन्म लियो कान्हा जब, बंधन कारागार खुले सब।
जग कल्याण हेतु प्रगट भए,आसुरि समाज भयभीत हए॥
कंस अत्याचार अति कीन्हा, हाहाकार मचे जग लीन्हा।
हुई आकाशवाणी भारी, हर्ष मग्न ह्वै प्रजा सारी॥
क्रोधवश कंस वसु ललकारे, छह पुत्र देवकी के मारे।
नंदघर वसुदेव पहुँचाई, मिलहिं पालक जसोदा माई॥
गोकुल माहीं लीला कीन्ही, सब ब्रजवासि आनंद दीन्ही।
कौतुक कान्हा बहुत दिखाए, नंद जसोदा अति हर्षाए॥
कालिया दमन जब प्रभु कीन्हा, जमुना जल पवित्र कर दीन्हा।
गरब चूर इंद्र हो जाई, ब्रजमंडल अति वृष्टि कराई॥
तुमने गोकुलबासि उबारे, नख पे गोवर्धन गिरि धारे।
मथुरा जाई कंस संहारे, सब देवन फिर चरण पखारे॥
तुम सम नाहीं तीनो लोका, प्रतिदिन जपैं हरै सब शोका।
हे मुरलीधर नटवर नागर, तुम हो नाथ दया के सागर॥
भव बंधन से मोहे तारो, जनम मरण से श्याम उबारो।
को नाहिं जो तुमको न माने, तुमरी महिमा सब जग जाने॥
तोरी लीला जात न कहाइ, राधा संग तुम रास रचाइ।
द्रोपदी लाज तुमने बचाइ, दुशासन वसन उतार न पाइ॥
महिमा तोरी भारी माधव, नहीं जानूँ मम बुद्धि लाघव।
विराट रूप अनंत दिखावा, अद्भुत बाणी पार्थ सुनावा॥
गीता सम ज्ञान सुमारग, मिले सत्पथ ह्वै जो कुमारग।
अकथ अनंत तिहारी माया, ज्ञानी सुधि जन पार न पाया॥
जो जन तुमरी आस लगावे, वो ही मनवांछित फल पावे।
मैं सेवक तुम नाथ हमारे, श्याम नाम ही भव से तारे॥
जब जब होई धर्म की हानि, तब तब प्रभु अवतार की ठानि।
गल धारै बैजंती माला, अधर बंशी मोर पख भाला॥
सुदामा दु:ख कान्हा टारे, सखा सनेह त्रय लोक वारे।
हे यदुनंदन कृपा कीजो, मोहे अपनी शरणन लीजो॥
जय जय जय हे गिरिवर धारी, पूरण कीजो आस हमारी।
तुम अवतार धरा पर लीन्हा, है उपकार जगत पे कीन्हा॥
निरगुन ज्ञान उद्धव पढा़ए, गोपिन श्याम प्रेम बस भाए।
तुमरी लीला अद्भुत भारी, गोपिन प्रेम से उधौ हारी॥
जब मीरा श्याम रंग राची, सुध बुध भूल प्रेमवश नाची।
अमृत बनो जहर का प्याला, सर्प बने फूलों की माला॥
हम मूढ़ नहिं तुम्हें पहचाने, वो तुमसा जो तुमको जाने।
पीत वसन तोरे तन सोहे, अधरन मुसकन मन को मोहे॥
जिसने श्याम नाम चित धारा, कान्हा ने वैतरणी तारा।
जाको कृपा होत कन्हाई, ताको हर विपदा टर जाई॥
बढ़हिं पाप कलजुग अब भारी, कान्हा चरण धरणि लो धारी।
‘हंस’ चालिसा तोरी गावे, हाथ जोड़ प्रभु तुम्हें मनावे॥

श्यामल तन पंकज नयन, अधर धरी मुस्कान।
हे मुरलीधर माधवा, तुम सम कोन सुजान॥
॥सोनू हंस॥

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