कुम्हार

रचता है कुम्हार भी, नित माटी से लाल।
माटी की मूरत बना,जीवन देता डाल।

दूर करे तम को सदा,काट निशा का जाल।
जोत जले भगवान का, रौशन जग का भाल।।

रोजी-रोटी के लिए, चाक चलाता रोज।
पेट मगर भरता नहीं, करे काम की खोज।।

कुम्भकार गुरु ढ़ालता, दीप रूप में शिष्य।
चढ़े चाक पर जब मृदा, बनता तभी भविष्य।।

ठोक-पीट कर प्यार से, पावक में दो सेक।
तप जाने के बाद ही,पात्र बनेगा नेक।।

मिट्टी डाले चाक पर, करे नया निर्माण।
माटी की पुतला गढ़े, उसमें डाले प्राण।।

जीवन चक्की चल रही, सतत् छाँव या धूप।
कुम्भकार रचना करे, गढ़े रूप अनुरूप

घुमा-घुमा कर चाक को,करे धैर्य से काम।
मिट्टी के बर्तन गढ़े,पाते अल्प इनाम।।

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