कुदरत।

जाने कैसे मुकाम पे आकर,
ये दुनिया गई ठहर है,

पिंजड़े में जानवरों को रखता था इंसान,
आज कैद घर में हर पहर है,

जाने कैसी शाम है ये,
और होती कैसी सहर है,

सारी दिशाओं में फैला हुआ,
भयानक मौत का ज़हर है,

सहम सी गई है ज़िंदगी मानो,
हर आंख में डर की लहर है,

झुंझला उठी हम इंसानों पे शायद,
आज कुदरत बरसाती कहर है,

जाने कैसे मुकाम पे आकर,
ये दुनिया गई ठहर है।

कवि-अम्बर श्रीवास्तव

ज़िला-बरेली (उत्तर प्रदेश)

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