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कुण्डलिया

Ranjana Mathur

Ranjana Mathur

कुण्डलिया

September 9, 2017

साथ बुरे का दोगे तो खुद भी बुरे कहलाओ।
कोयले की ये कोठरी कैसे खुद को बचाओ।
कैसे खुद को बचाओ बहुत कठिन है भाई।
संगत की रंगत तो हरदम दिखती आई।।
कहे रंजना सुनो न डालो कीचड़ में तुम हाथ।
संतों की संगत करो छोड़ अधम का साथ।।

—रंजना माथुर दिनांक 09/09/2017
मेरी स्व रचित व मौलिक रचना
©

Author
Ranjana Mathur
भारत संचार निगम लिमिटेड से रिटायर्ड ओ एस। वर्तमान में अजमेर में निवास। प्रारंभ से ही सर्व प्रिय शौक - लेखन कार्य। पूर्व में "नई दुनिया" एवं "राजस्थान पत्रिका "समाचार-पत्रों व " सरिता" में रचनाएँ प्रकाशित। जयपुर के पाक्षिक पत्र... Read more
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