Jun 26, 2016 · कुण्डलिया
Reading time: 1 minute

कुण्डलिया

मँहगाई नकदी रहे, होती नहीं उदार |
इसका कब शनिवार या, होता है रविवार ||
होता है रविवार, जहाँ इक छुट्टी का दिन,
वहीँ पसारे पैर, और ले बदले गिन गिन,
मैं हूँ कवि मतिमंद, न जाना इसको भाई,
फूली है इस देश, सदा ही यह मँहगाई ||

~ अशोक कुमार रक्ताले

1 Like · 2 Comments · 17 Views
Copy link to share
Ashok Kumar Raktale
16 Posts · 858 Views
You may also like: