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कुण्डलियाँ

Rajpal Singh Gulia

Rajpal Singh Gulia

कुण्डलिया

February 24, 2017

पैसे बिन संसार में , हुआ नहीं कुछ काम .
मोल लिया है बैर भी , देकर उनको दाम .
देकर उनको दाम , बनाया दुश्मन जानी .
नहीं किसी का दोष, हुई हमसे नादानी .
कह गुलिया कविराय , लोग बहुतेरे ऐसे .
साथ निभाते खूब , मिलें ना जब तक पैसे.
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बातें सुन अधिकार की , पूछे इक लाचार .
कब मिलेगा हमें यहाँ , रोटी का अधिकार.
रोटी का अधिकार , रहे ना कोई भूखा .
मिले सभी को कौर , भले हो रूखा सूखा .
कह गुलिया कविराय, हों ऐसी करामातें .
पूर्ण करे भगवान , सभी के मन की बातें .
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रैली , भाषण , घोषणा , नारे और प्रचार .
मत हथियाने के यही , हैं सारे हथियार .
हैं सारे हथियार , चुनाव में आजमाते .
बातों से ये तोड़ , गगन के तारे लाते .
कह गुलिया कविराय ,देखलो इनकी शैली
जुट जाती है भीड़ , जहाँ ये करते रैली
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रिश्वतखोरी का यहाँ , गरम हुआ बाजार .
झूठ दौड़ता देख लो , लेकर पाँव हजार .
लेकर पाँव हजार , करें रिश्वत की पूजा .
बिन रिश्वत के काम ,सूझे न इनको दूजा .
कह गुलिया कविराय , करें ये सीनाजोरी.
खुश हैं रिश्वतखोर , देखकर रिश्वतखोरी.

Author
Rajpal Singh Gulia
हरियाणा शिक्षा विभाग में अध्यापक
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