कुण्डलियाँ

अपनी अपनी अहमियत, सूई या तलवार ।
उपयोगी हैं भूख में, केवल रोटी चार ॥
केवल रोटी चार, नहीं खा सकते सोना ।
सूई का कुछ काम, न तलवारों से होना ।
‘ठकुरेला’ कविराय, सभी की माला जपनी ।
बड़ा हो कि लघुरूप, अहमियत सबकी अपनी ॥

सोना तपता आग में, और निखरता रूप।
कभी न रुकते साहसी, छाया हो या धूप॥
छाया हो या धूप, बहुत सी बाधा आयें।
कभी न बनें अधीर, नहीं मन में घबरायें।
‘ठकुरेला’ कविराय, दुखों से कैसा रोना।
निखरे सहकर कष्ट, आदमी हो या सोना॥

— त्रिलोक सिंह ठकुरेला

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