कुछ ख़त मोहब्बत के

कुछ ख़त मोहब्बत के, जब मिले किताबों में।
दिल ढूँढने बैठ गया, तुम्हे उन्ही लिफाफों में।
धड़कन की हलचल भी, चल दिये शिताबो में।।
कुछ ख़त मोहब्बत के, जब मिले किताबों में।।

गढ़े शब्द तुमने सुंदर, थे हर वादे तेरे निच्छल।
पढ़ पढ़ के जिसे मेरे, हो गये नयन ये सजल।।
कब पूरी करोगी मुझे, थी न लिखी जवाबों में।
कुछ ख़त मोहब्बत के, जब मिले किताबों में।।

माना कि हो गए गुम, हर प्रेम निशानी पर।
जो भूल लड़कपन को, तू हुई सयानी पर।।
पर अब भी तेरी खुशबू, है तेरे दिए गुलाबों में।
कुछ ख़त मोहब्बत के, जब मिले किताबों में।।

वो तेरी बातें नशीली सी, वो आँखे शराबी से।
बेरंग हुये तुझ बिन, वो सारे सपने गुलाबी से।।
तो क्यों होश उड़ाती हैं, मेरा अब भी ख्वाबों में।
कुछ ख़त मोहब्बत के, जब मिले किताबों में।।

तेरी खुशियों के खातिर, कब तलक मिटूंगा मैं।
कागज़ पे आसुंओं से, कब तलक लिखूंगा मैं।।
कितना खर्च हुआ हूँ ये, लिख लेना हिसाबों में।
कुछ ख़त मोहब्बत के, जब मिले किताबों में।।

©® पांडेय चिदानंद “चिद्रूप”
(सर्वाधिकार सुरक्षित ३१/१२/२०२०)
गाज़ीपुर उत्तरप्रदेश :- २३२३२८

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