कुछ लघु रचनाएं

अब दुनियां में सम्बन्धों की,
इक पहचान लिफ़ाफ़ा है l
हर रिश्ते में. हर नाते में,
बसती जान लिफ़ाफ़ा है l
चाहे बजती शहनाई हो,
या मातम हो मरने का l
जहाँ भी देखो दुनियादारी,
का ऐलान लिफ़फ़ा है l
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कातर नदिया तड़प रही है,
अपनी पीर सुनाने को l
फिर उतरो धरती पर माधो,
इसका चीर बचाने को l
कुछ दुर्योधन और दुशासन,
इस पर नज़र गढ़ाते हैं l
इसका जल-दोहन करने को,
नित नए दाँव लड़ाते हैं l
इस धरती पर इक महाभारत,
फिर से आज रचाने को l
कातर नदिया तड़प रही है,
अपनी पीर सुनाने को l
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बूढ़ी अम्मा के खाते में,
जब-जब पैसा आता है l
सात समुन्दर पार से आकर,
बेटा शीष नवाता है l
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फिर आकर दिनकर ने अपनी आभा छोड़ी,
और गगन भी जागा नीली चादर ओढ़ी l
चन्दा-तारे गए शयन को अपने-अपने,
मेघों से भी हुई शरारत थोड़ी-थोड़ी l

-राजीव ‘प्रखर’
मुरादाबाद (उ. प्र.)
मो. 8941912642

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