****** कुछ मुक्तक

“अनुप्रास” अलंकार में

( १ )
छैल छबीली छब्बीस की छोरी |
छोकरे संग छत्त पर करे छिछोरी |
छेड़-छाड़ छब्बू ने छत पर देखा,,
छिप-छिपा के छिपती भागी गोरी ||

( २ )
फूँ-फूँ फूँफकार चली फगुनी बयार |
फर्र – फर्र फड़फडा उठे पत्ते हजार |
फहर – फहर के फिर फहराने आई,,
फन फैलाए फैली फिर फगुनी बहार ||

( ३ )
जवानों की जवानी जौहर की निशानी |
जवानों के जोश हैं जज़्बात की कहानी |
जमाना ये जानता जीत है जवानों की,,
जय हो जवानों की जयकारे हो जुबानी ||

(४)
चार चोर चाहे चार दिनों से चोरी करना |
चाची चाहे चुप्पे-चुप्पे चोरों को पकड़ना |
चाचू को चाची ने चौकीदार तक पहुँचाई,,
चारों चकराए फिर पड़ा चक्की पीसना ||

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दिनेश एल “जैहिंद”
20. 01. 2017

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