कुछ नही बचा अब

कुछ नहीं बचा अब
सब खत्म हो गया
उम्मीद की बूंद का आखिरी कतरा भी
आज आंखों से बह गया
बंद कमरे का अंधेरा
आज मुझसे मेरी रोशनी छीन गया
कुछ नही बचा अब
बस कुछ ख़्वाब बचे थे
वो भी टूट गए
अब और कुछ रंगने को रंग नहीं बचा
कुछ लिखने को स्याही नहीं बची
अब और क्या कहूँ
लहू को पसीना बनाने का शौक रखता था कभी
लीक से हटकर चलने पर यकीन रखता था
मंजिल की तलाश में बेपरवाह भटकता था कभी
आज वक़्त ने कुछ ऐसे तोड़ा है
बस चंद साँसे बची है हिस्से में
और मेरा बीतता वक़्त मुझे अंदर ही अंदर
तोड़ रहा है
कुछ नही बचा अब
टूटती उम्मीदों के संग
अब साँसे भी धीरे-धीरे टूट रही है—अभिषेक राजहंस

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