Skip to content

कुछ दोहे…

त्रिलोक सिंह ठकुरेला

त्रिलोक सिंह ठकुरेला

दोहे

October 9, 2016

फँसी भंवर में जिंदगी, हुए ठहाके मौन ।
दरवाजों पर बेबशी, टांग रहा है कौन ।।

इस मायावी जगत में, सीखा उसने ज्ञान ।
बिना किये लटका गया, कंधे पर अहसान ।।

महानगर या गाँव हो, एक सरीखे लोग ।
परम्पराएँ भूल कर, भोग रहे है भोग ।।

किस से अपना दुःख कहें, कलियाँ लहूलुहान ।
माली सोया बाग़ में, अपनी चादर तान ।।

कपट भरें हैं आदमी, विष से भरी बयार ।
कितने मुश्किल हो गए, जीवन के दिन चार ।।

खो बैठा है आदमी, रिश्तों की पहचान ।
जिस दिन से मँहगे हुए, गेंहूँ, मकई, धान ।।

खुशियाँ मिली न हाट में, खाली मिली दुकान ।
हानि लाभ के जोड़ में उलझ रहे दिनमान ।।

— त्रिलोक सिंह ठकुरेला

Share this:
Author
त्रिलोक सिंह ठकुरेला
त्रिलोक सिंह ठकुरेला कुण्डलिया छंद के सुपरिचित हस्ताक्षर हैं.कुण्डलिया छंद को नये आयाम देने में इनका अप्रतिम योगदान है.

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग से अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें और आपकी पुस्तक उपलब्ध होगी पूरे विश्व में Amazon, Flipkart जैसी सभी बड़ी वेबसाइट्स पर

साहित्यपीडिया की वेबसाइट पर आपकी पुस्तक का प्रमोशन और साथ ही 70% रॉयल्टी भी

साल का अंतिम बम्पर ऑफर- 31 दिसम्बर , 2017 से पहले अपनी पुस्तक का आर्डर बुक करें और पायें पूरे 8,000 रूपए का डिस्काउंट सिल्वर प्लान पर

जल्दी करें, यह ऑफर इस अवधि में प्राप्त हुए पहले 10 ऑर्डर्स के लिए ही है| आप अभी आर्डर बुक करके अपनी पांडुलिपि बाद में भी भेज सकते हैं|

हमारी आधुनिक तकनीक की मदद से आप अपने मोबाइल से ही आसानी से अपनी पांडुलिपि हमें भेज सकते हैं| कोई लैपटॉप या कंप्यूटर खोलने की ज़रूरत ही नहीं|

अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें- Click Here

या हमें इस नंबर पर कॉल या WhatsApp करें- 9618066119

Recommended for you