गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

कुछ तो अलग होना चाहिए

दिन है और रात है
कभी तो बीच का मंजर भी होना चाहिए।
साहिल पर आकर लहरें लौट जाती हैं अक्सर
कभी तो उन्हें भी वहीं रुक जाना चाहिये
घटाएं क्यों रह रह कर शोर मचाएँ हरदम
बूंदों को बिन पूछे बरस जाना चाहिए
आवारा सी घूमती हैं हवाएंँ ना जाने क्यूँ
कभी उन्हें भी तो कमरों में ठहर जाना चाहिये
वक्त है कि देखो रुकता ही नहीं है कभी
कभी उसे भी तो थक कर सो जाना चाहिए।
इंसान दौड़ रहा हर क्षण पागलों की तरह
जहाँ मिले सुकूँ की ज़मी उसे वहीं बस जाना चाहिए।
खुशियों का दौर बहुत कम ही चलता हैं
ये जो नफ़रत है ना! उसे तो बर्फ के टुकड़ों में जम जाना चाहिए।
जो जंग छिड़ी है अच्छाई और बुराई के बीच
क्यूँ ना उसे कब्र में ही दफ़न हो जाना चाहिए।

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