कविता · Reading time: 1 minute

कुछ गीत मिट्ठे बोल दो

कुछ गीत मिट्ठे बोल दो
कुछ शब्द प्रीत के घोल दो
सुभाषिनी तुम सुहासिनी
फाँक लबों की खोल दो।
कुछ गीत मिट्ठे बोल दो ।

कुछ पद्य ज़ुबाँ से बोल दो
कुछ पराग हवा में घोल दो
हृदयपावनी तुम सुखछावनी
द्वार दिलों के खोल दो
कुछ गीत मिट्ठे बोल दो।

कुछ राग विभा के बोल दो।
कुछ कण सुधा के घोल दो
प्रेमरागिनी तुम मधुयामिनी
ब्यार रंगों की डोल दो
कुछ गीत मिट्ठे बोल दो

देवेन्द्र दहिया- अम्बर
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