कुछ कर

कुछ कर !

१। उम्मीदों के घरोंदे, गिरा मुँह औंधे।
घर आँख लगाए छत पर,
कहता है कुछ कर !

छत पर बैठा है कागा ,
बांधे सिर पर कोई पागा।
घर में न रोटी है न धागा,
कुछ उम्मीदे है बाकि ,
जीने को आधा-आधा।
ये गिरती दीवारे टूटकर,
कहती है कुछ कर !

त्योहारो से भरा वो आँगन ,
दीवारों पे वो रंग रोंगन ,
घर में बैठी वो जोगन ,
ढूंढती है निशान ,
कहाँ गया वो साजन ,
जो चला गया हैं रूठकर ,
कहता है कुछ कर!

रिश्ते थे रिश्तो में प्यार था ,
प्यार से भरा परिवार था ,
आँगन में खुशियों का संसार था ,
हंसती खेलती कलियां थी ,
और कलियों से गुलशन में बहार था ,
वक्त जो ले गया सब लूटकर ,
कहता है कुछकर !

मंज़िल खोले अपनी बांहे ,
रस्ता देखे तेरी राहें ,
क्यों भरता है तू आंहे ,
है आसान ऐ इंसान ,
गर चलना तू चाहे ,
जिंदगी बैठी है जो हठकर ,
कहती है कुछ कर !

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साहित्य का विद्यार्थी
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