कविता · Reading time: 1 minute

कुछ आग मुझमें भी है

कुछ आग मुझमें भी है
एक विश्वास मुझमें भी है ।
चाँद धरती पे उतार दूंगा
कुछ खास मुझमें भी है ।
मैं बिखरा हूँ पर टूटा नही
जीतने की आस मुझमें भी है
वो मुझे मुर्दा समझ रहे है
बची आखरी साँस मुझमें भी है ।
रो देता हूँ दूसरों के गम में भी
ज़िन्दा एक इंसाँ मुझमें भी है ।
– चिंतन जैन

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