कुकुभ छंद

कुकुभ छंद…!
(30 मात्रा भार , 16-14 पर यति , चरणांत दो गुरु)
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मात शारदे हंसवाहिनी,श्वेत वसन हैं तन धारे ।
अक्षमाल वीणा कर सोहे,सजे कर्ण कुण्डल प्यारे ।।
वेदत्रयी हाथों में मोहे,भव्य किरीट शीश धारा ।
सुन सरगम सारंग नाचते,दृश्य मनोहर अति प्यारा ।।
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राम-नाम की महिमा प्यारी, नाम राम का सुखदाई ।
वो धनवान सभी से जग में , जिसने यह दौलत पाई ।।
वाल्मीकि तुलसी ने गाथा , राम-नाम की लिख गाई ।
शीश नवाता है जग उनको , कृपा राम ने बरसाई ।।
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दौलत बिखरी पड़ी जगत में, अपनी झोली भर लेना ।
जानबूझ कर कभी किसी को , नहीं भूलकर दुख देना ।।
नेक कर्म जो करते जग में, वे जन अच्छी गति पाते ।
सत्कर्मों के चुम्बक से खिंच, धन-यश-वैभव-गुण आते ।।
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-महेश जैन ‘ज्योति’
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"जीवन जैसे ज्योति जले " के भाव को मन में बसाये एक बंजारा सा हूँ...
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