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कुंभ के मेले में

मेरा सत्य यात्रा संस्मरण

बात लगभग आज से बाईस-तेईस वर्ष पूर्व की है। मेरा मायका उज्जैन (मध्य प्रदेश) में होने के कारण मैं साल में एक या दो बार सपरिवार उज्जैन जाया करती थी। सन् 1996 का साल था। माह ठीक से याद नहीं।
उन दिनों अजमेर में कोई मेला चल रहा था। खंडवा-अजमेर एक्सप्रेस ट्रेन प्रातः साढ़े आठ बजे अजमेर जंक्शन पर आकर रुकी। मैं अपने पति व बच्चों के साथ गाड़ी से नीचे उतरी। मेरे पति कुली से सामान उतरवा रहे थे और मैं सामान की गिनती करने में व्यस्त हो गयी थी।
मेले के कारण अजमेर के रेलवे स्टेशन पर पर्यटकों की अच्छी खासी भीड़ व गहमा-गहमी थी। इसी कारण रेलवे विभाग द्वारा भी निरन्तर माइक पर जेबकतरों व बच्चों को उठाने वालों से सावधान रहने की हिदायत संबंधी उद्घोषणा की जा रही थी।
मेरे साथ मेरी बेटी व तीनों बेटे थे। मेरी सबसे छोटी संतान जुड़वां बेटे हैं।

अचानक मेरी नजर भरी भीड़ में से मेरे साढ़े चार वर्षीय बड़े बेटे बिट्टू पर पड़ी। वह बदहवास-सा
अपने दोनों छोटे (लगभग ढाई वर्षीय) भाइयों को दोनों हाथों से पकड़ कर खींचता हुआ ला रहा था। मैं घबरा कर दौड़ी और बिट्टू से पूछा- “क्या बात है बेटा”
“तू इन दोनों को कहाँ से ले कर आ रहा है बेटू ? ”
उसने तुतलाई बोली में बताया कि – “अले मांँ मेले दोनों भैया किछी आंती के छाथ भीड़ में चले जा लहे थे। आपने नईं देथा । मांँ ये दोनों ऐछे थो जाते जैछे पिक्चल में तुंब ते मेले में जुलवां भाई थो जाते हैं।”
“फिल अपन त्या कलते।”
” मैंने जल्दी छे दौल कल इन दोनों को पकला।”
मेरी तो रूह काँप गई। मैंने तुरन्त तीनों बच्चों को गले से लगा लिया। नन्हे से बच्चे ने अपने दोनों छोटे भाइयों को बचा लिया था। ईश्वर ने ही उसे मार्गदर्शन दिया था। वह यात्रा मैं आजीवन नहीं भूल सकती। आज भी मेरे बेटे को यह घटना यथावत याद है। मैं इसे याद करके आज भी सिहर उठती हूँ।
बिट्टू ने तत्परता न दिखाई होती तो न जाने क्या अनर्थ हो जाता।

रंजना माथुर
जयपुर (राजस्थान)
नाम- रंजना माथुर

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