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कुंडलिया छंद

कुंडलिया छंद-
मिलना मुश्किल हो गया,जग में अच्छे मित्र।
अंकित सबके हृदय में,एक स्वार्थमय चित्र।
एक स्वार्थमय चित्र,करे बस चिंता अपनी।
मुँह में केवल दोस्त,स्वयं की चले सुमिरनी।
मिले न कोई धाय,भूल सब बैठे खिलना।
रहिए अपने गेह,किसी से क्योंकर मिलना।।
डाॅ. बिपिन पाण्डेय

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डाॅ. बिपिन पाण्डेय
डाॅ. बिपिन पाण्डेय
सीतापुर
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साहित्य अध्येता Books: साझा संकलन कुंडलिनी लोक (संपादक - ओम नीरव) संपादित दोहा संगम (दोहा...
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