कविता · Reading time: 1 minute

कीमत इन्सान की

घटती जा रही है
कीमत इन्सान की
पैसा होता जा रहा है
बाप इन्सान का
बढते जा रहे है
बे-ईमान इन्सान
समाज में
दरिन्दों की फौज है और
इन्सानियत आज मजबूर है

होते थे घर खपरैल के
बैठते थे चौपाल में
होती थी बात में दम
दाम नहीँ लगाते थे
बात की

माँ बाप मजबूर हैं
स्वार्थी बच्चे साथ हैं
है कीमत तब तक ही
जब तलक मतलब साथ है

बढ़ गयी है कीमत
भगवान की
लेता मंहगे टिकिट
इन्सान जब
देते दर्शन भगवान तब

हो कीमत
इन्सानियत की
मानवता की
भाईचारे की
होगी भलाई तब ही
समाज की

स्वलिखित
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल

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