"किस बात के साथ खड़े हो"

आज एक भाई ने बात छेड़ दी नसरुद्दीन शाह साहब की, बोला कि जब हमलोग साथ खड़े हैं तो उनको डर किस बात का, उनको सभी धर्म के लोग नहीं देखते तो वो इतने बड़े स्टार नहीं होते, उनको डर वर कुछ नहीं है सिर्फ राजनीति कर रहे हैं। तब एक कविता का भाव आया, पढिए इसको~

किस बात के साथ खड़े हो,
जब एक भाई का दर्द राजनीति लगता है,
ये डर ऐसे नहीं आता मेरे भाई,
इसके लिए सैकड़ों अखलाक को मरना पड़ता है,
बेशक ये घर उनका मेरा हम सबका है,
पर यहां तो आदमी को राष्ट्रप्रेम भी साबित करना पड़ता है,
कभी उतार के देखना चोगा अंधभक्ति का,
यहां नजीब की मां को बेटे के लिए कितनी जलालत झेलना पड़ता है।
शर्म से ना झुक जाय तुम्हारी आंखे तो कहना,
जब एक मुसलमान को मीट खाते हुए शक के निगाहों से गुजरना पड़ता है,
जब एक बच्चा लंचबॉक्स में चिकन ले जाने से डरता है,
जब एक आदमी को मीट खाने बेचने पर भीड़ के हाथों चढ़ना पड़ता है,
मेरे भाई तब डर लगता है, लगना भी चाहिए,
की किस ओर जा रहा है भगत अशफाक का देश,
सिर्फ साथ खड़ा हूं कहने से कोई साथ नहीं होता,
इसके लिए साथ खड़े होकर दिखाना पड़ता है!!!

……राणा…..

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