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किस्से पुराने याद आये है।

आज किस्से फिर पुराने कुछ याद आये है,
कुछ तज़ुर्बे है जो फिर लिखाये गए हैं

घर की दीवारों को शीशे में बदला क्या मैंने,
हर एक हाथ से ही पतथर उठाये गए हैं।

हकीकत तो वही थी पर दिल ने ना मानी,
झूठ के पैवंद यहाँ सिलवाये गए हैं।

समझ सकते तो नज़रो से ही समझ जाते,
क्यों ये ज़ज़्बात डायरी में लिखाये गए हैं।

रखा है संभाले वो कागज़ आज तलक,
जिसपे दस्तखत ज़मानत के एवज़ कराये गए हैं।

खतायें तो दोनों तरफ बराबर ही रही थी,
फिर क्यों हर बार हम ही समझाये गए हैं।

तमन्नाओ की कब्र तो पुरानी ही थी,
कुछ नए ख़्वाब भी इसने दफनाए गए हैं

किसी को भी न छोड़ा हाय किस्मत तूने,
तेरे इशारे पर सारे ही नचाये गए हैं…।

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Saurabh Purohit
Saurabh Purohit
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Saurabh purohit M.B.A from Jhansi working in Delhi. View full profile
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