Skip to content

किस्सा / सांग – # चमन ऋषि – सुकन्या #

लोककवि व लोकगायक पं. राजेराम भारद्वाज संगीताचार्य @ संकलनकर्ता - सन्दीप कौशिक, लोहारी जाटू, भिवानी - हरियाणा |

लोककवि व लोकगायक पं. राजेराम भारद्वाज संगीताचार्य @ संकलनकर्ता - सन्दीप कौशिक, लोहारी जाटू, भिवानी - हरियाणा |

कविता

August 17, 2017

सांग 13- चमन ऋषि . सुकन्या

वार्ता:-
सज्जनों! जब पाण्डवों को वनवास मिला हुआ था उस समय पांचों पाण्डव और साथ में द्रौपदी रानी लोमश ऋषि के आश्रम में गये। उन्हें देखते ही ऋषिवर ने पूछा हे राजन् ! क्या कारण है कि आप द्रौपदी रानी सहित सभी भाई वन में विचरण कर रहे हो। फिर धर्म पुत्र युधिष्ठिर ने अपनी जुए वाली सारी कहानी बताते हुए कहा कि हे ऋषिवर! हमारा सम्पूर्ण राज्य कौरवों ने धोखे से जीत लिया। हमारे जैसा इस संसार में दुखी कोई नहीं है। इसलिए वनवासी हुए फिरते है। फिर धर्म पुत्र की बात सुनकर ऋषि लोमश ने कहा हे महारथी ! पाण्डूनंदन तुमसे पहले तो बहुत से बड़े बड़े दुखी हो चुके है। इसलिए मै आपकी संतुष्टि के लिए एक प्राचीन इतिहास सुनाता हॅू जिसका नाम है. चमन ऋषि और सुकन्या । ये कथा उस समय की है जब 12 वर्ष की लड़की सुकन्या ने अपने बूढे़ पति च्यवन ऋषि जो अंधा था उसको पतिव्रता धर्म और सतीत्व से जवान बना लिया था। जो ब्रह्मा जी से मरीचिए मरीचि के पुत्र कश्यपए कश्यप के पुत्र विवस्वान (सूर्य), विवस्वान (सूर्य) के मनु, मनु के दसवें पुत्र शर्याति राजा और सूर्यवंशी खानदान मे राजा शर्याति की लड़की सुकन्या हुई और उधर फिर भृगुवंशी खानदान मे फिर चमन ऋषि हुए द्य फिर लोमश ऋषि उन पांडवो को उस प्राचीन इतिहास के बारे मे कैसे बताते है|

जवाब – लोमश ऋषि का रागनी – 1

पाण्डू गये आश्रम के म्हां ले गैल द्रौपदी राणी नै
लोमश ऋषि बतावण लागे एक प्राचीन कहाणी नै। । टेक।

परमजोत परमेश्वर नै शक्ति से आसमान रचे,
नाभि से कमल, कमल से ब्रह्मा जिसनै सकल जहान रचे,
ग्यारह रूद्र रचे क्रोध से फिर सबके अस्थान रचे,
बामे अंग तै शतरूपा नारी स्वयंभू मनु जवान रचे,
उन दोनो का ब्याह करवाया खुद ब्रहमा ब्रहमाणी नै ।।

बारह सूर्य छप्पन चांद 51 विष्णु विश्वे बीस हुए,
जल वायु से जगत रचाया, जगत पिता जगदीश हुए,
14 मनु 700 इन्द्र कल्प में एक महीश हुए,
सामवेद संगीत कला मै नृत राग छतीस हुए,
तीन ताल सुर सात बताये सरस्वती कल्याणी नै ।।

ब्रह्मा से मरीचि, मरीचि के कश्यप, कश्यप कै 13 नारी,
13 के मनुज देवता निश्चर किन्नर गंधर्व देह धारी,
कश्यप का बेटा होया सूर्य करदी अग्न पवन जारी,
अण्ड पिण्ड उद्भेज जेरण्ड से देई रच दुनिया सारी,
मोह माया से मिथुन सृष्टि रचि आग और पाणी नै ||

सूर्य कै बेटा हुआ मनु जिसनै दस अश्वमेघ रचाई थी,
दस पुत्र हुई कन्या ग्यारहवी जो बुध गैला परणाई थी,
दसवां पुत्र शर्याति राजा जिसकै सुकन्या जाई थी,
भृगुवंशी खानदान में वा च्यवन ऋषि के ब्याही थी,
कहै राजेराम कथा महाभारत मैं देख ब्यास की वाणी नै ।।

रागणी:- 7
वार्ता:-
सज्जनों! राजा शर्याति ऋषि की बात सुनके कहती है कि हे ऋषि ये सुकन्या नादान लड़की थी | इसने अनजाने मे ये इतना बड़ा कसूर कर दिया द्य फिर चमन ऋषि कहता है कि हे राजन ! मेरे दोनों नेत्र फूटने से मै अँधा हो गया हूँ और अब बुढ़ापे मे मुझ अंधे की सेवा कौन करेगा द्य और फिर कहता है कि जिसको जो चोट लगती है उसको ही पता होता है कि दर्द क्या होता है इसलिए इसने जो गलती की है उसको इसका फल जरुर भोगना पड़ेगा द्य इस प्रकार चमन ऋषि अपनी जिद्द पर अड़ीग रहता है द्य फिर राजा कहता है कि हे ऋषि ! गलती हमेशा इन्सान से ही होती है | राजा शर्याति एक बार फिर से हाथ जोड़कर चमन ऋषि से माफी मांगता है और ऋषि के पैर पकड़कर क्या कहता है।

जवाब:- राजा का।

हाथ जोड़के बोल्या छत्री पकड़ ऋषि के पांव,
आदमी तै हो सै गलती माफ करी जा। । टेक।।

के करले इंसान होणी आपणे बल चलती,
ग्रहचाल और बख्त घड़ी ना टाले तै टलती,
पायां मै लोटज्या तै के नहीं दुश्मन माफ करै गलती,
राखी लहाज रहै माणस की आंख सदा मिलती,
सुबेरै ते शाम ढलती फिरती हो सै छां।।

मेरी सुकन्या बेटी याणी बारह साल की,
गलत मुहूर्त टेम घड़ी थी कोए ग्रहचाल की,
भूल गये ब्रह्मा गिणती सागर की झाल की,
सूर्य का भी अर्थ डटया ऋषियों की पालकी,
निर्भंग प्रजा पड़ी काल की ना राणी भोजन खां।।

लिछमी और लुगाई सुन्नी कदे घर पै ना डटै,
जींदे जी कमाये बिना उम्र ना कटै,
कर्म करया फल नहीं मिलै कौण राम नै रटै,
पक्के प्रण बात के छत्री उल्टे ना हटै
बरते बेरा पटै किसा माणस का शील सुभा।।

चैबीसी के साल बणी रागणी तमाम,
गाम हमारा लुहारी सै जमीदारा काम,
पाणची सै पुर कै धोरै गुरू जी का धाम,
अवधपुरी का राजा सू शर्याति मेरा नाम,
कहै राजेराम माफ करदे सुकन्या दूंगा ब्याह।।

रागणी:- 13

वार्ता:-
सज्जनों! फिर सुकन्या दुसरे भेष मे उन अश्वनी कुमारो पहचान नहीं पाती है और अश्विनी कुमारों की अह्की-बहकी बात सुनकर सुकन्या क्या कहती है।

जवाब:- सुकन्या का अश्विनी कुमारों से।

सादी भोली बीर सूं करण पति की टहल आई जंगल बियावान मै। । टेक।

मै याणी बड़ेरा पति टहल दिन रात करूं,
संत अतिथी का आदर जोड़के नै हाथ करूं,
थारे कैसे लफंंग्या तै कदे नहीं बात करूं,
फालतू निकम्में घर तै फिरै सै लफंगे चोर,
किसे का एतबार नहीं आ लिये भतेरे और,
डर लागै भयानक दिखै जंगल मै अंधेरा घोर,
कहै री थामनै अखिर सूं इब तलक ना थारै आई बात मेरी ध्यान मै।।

भृगुं जी के सात बेटे पोलमा थी जिसकी नार,
दाता विधाता मर्कण्डु च्यवन कवि शुक्राचार,
औरंग ऋषि के बेटे थे ऋचक ऋषि आज्ञाकार,
एक राजा गांधी की बेटी सत्यवती जिसका नाम,
ऋचक ऋषि ब्याहके ल्याया जमदग्नि गये थे जाम,
जमदग्नि के पांच बेटे सबतै छोटे परशुराम,
मै वाहे शमशीर सूं जो सहश्रार्जुन तै होई लड़ाई रूक्का पडय़ा जहान मैं।

मरीचि ब्रह्मा के बेटे पढ़े लिखे थे विद्वान,
मरीचि के बेटे कश्यप, कश्यप के सूर्य नाराण,
सूर्य जी कै मनु होया शर्याति जिसकी संतान,
ससुर मेरे भृंगु जी नै या संहिता बना राखी,
भुंगु पुत्र च्यवन ऋषि या बात ना छुपा राखी,
मै शर्याति की सुकन्या च्यवन ऋषि कै ब्याह राखी,
यो सरवर मै नीर सूं मात पिता नै पल्लै लाई सोचू सूं भगवान मै।।

मानसिंह तै बुझ लिये औरत सूं हरियाणे आली,
लख्मीचंद तै बुझ लिये गाणे और बजाणे आली,
मांगेराम तै बुझ लिये गंगा जी में नहाणे आली,
भिवानी जिला तसील बुवाणी लुहारी सै गाम मेरा,
कवियां मै संगीताचार्य यो साथी राजेराम मेरा,
मै राजा की राजकुमारी सुकन्या सै नाम मेरा,
कन्या शुद्ध शरीर सूं च्यवन ऋषि की गैल ब्याही भृंगु खानदान मै।।

  रागणी:- 14
वार्ता:-
सज्जनो | सुकन्या वहां से जल भरके कुटी पर आ जाती है फिर अश्विनी कुमार परीक्षा हेतु शाम को ब्राहम्ण के वेश में च्यवन ऋषि के आश्रम पर आ जाते है और वे एक रात बसेरा मांगते हुए उस सुकन्या से क्या कहते है।

जवाब:- अश्विनी कुमारों का सुकन्या से।

दो अतिथि घणी दूर के मांगै रात बसेरा हे |
रास्ता भूल कुटी पै आगे देख आश्रम तेरा हे।। टेक।

भूखे प्यासे बियावान मै धक्के खाते डोलै
काल सुबह रोटी खाई थी भूख कालजा छोलै
जगहां ओपरी डर लागै ना किवाड़ कुटी के खोलै,
उल्लू बागल कुटिल कोतरी श्वान सामनै बोलै
रीछ भेड़िया बंदर भालू चीता शेर बघेरा हे।।

दिन छिप्या शाम होई आंख्या मै धूल पड़ी रस्ते में,
किले पहाड़ छुटगी राही भूल पड़ी रस्ते में,
दिल गया टूट सोच मै काया कूल पड़ी रस्ते में,
कांटे झाड़ी पैर उघाणे शूल पड़ी रस्तें में,
कीकर कांच नागफण बांसा राह मै खडय़ा पटेरा हे।।

बिन बुलाया रोज अतिथि कौण किसे कै आवै
दाणा पानी लिख्या कर्म का भौं कोये सेती ल्यावै
बीर निकम्मी पुरूष आदमी देखके नाक चढावै
धर्म और श्रद्वा भागवान कै रोज अतिथि आवै
चातर बीर लक्ष्मी घर मै होया करै पां फेरा हे।।

लख्मीचंद स्याणे माणस गलती मै आणिये ना सै,
मांगेराम गुरू के चेले बिना गाणिये ना सै,
ब्राहम्ण जात वेद के ज्ञाता मांग खाणिये ना सै,
तू कहरी डाकू चोर, किसे की चीज ठाणिये ना सै,
राजेराम रात नै ठहरा ओं म्हारा घर डेरा हे।।

  रागणी:- 16
वार्ता:-
सज्जनों! फिर अश्वनी कुमार चमन ऋषि के आश्रम मे ठहरते है और भोजन करते है द्य इस प्रकार आपस मे बाते करते है और फिर अश्वनी कुमार देखते है कि सुकन्या तो जवान और चमन ऋषि बहुत वृद्ध हो चुके है फिर अश्वनी कुमार इस बेमेल विवाह को देखके चमन ऋषि से कहते है कि कि आप तो बहुत वृद्ध हो चुके थे इसलिए आपको तो शादी नही करनी चाहिए थी द्य इस प्रकार फिर अश्वनी कुमार उस चमन ऋषि को क्या कहते है |

जवाब:- अश्वनी कुमारों का।

गृहस्थ आश्रम घरबारी का आत्म खेल रहे जा सै,
बीर-मर्द जीवन के साथी जीवन मेल रहे जा सै। ।टेक।

दुनियां बांधै उम्र के पाले दिन और रात कमाए जा,
पत्नी का धर्म पति की सेवा करकै साथ निभाए जा,
इज्जत धर्म मान मर्यादा लोक ल्हाज मै गाए जा,
पति का रूप सति की शक्ति बैठी पूत खिलाए जा,
पिता से पूत, पूत से चलती वंश की बेल रहे जा सै।।

मोह माया मै फंसी दुनिया सहम बावली होरी सै,
पति पत्नी जीवन के साथी बंधी प्यार की डोरी सै,
मन की ममता तन की तृष्णा चित की चिंता चोरी सै,
गाड़ी जगत पाप पूण्य पहिए पति और पत्नी धोरी सै,
गाड़ी चलै घूमता पहिया सख्त सकेल रहे जा सै।।

उम्र पुराणी धोले आगे तनै चाहिए ब्याह सगाई ना,
बुढ़ा बारै पूत कुपात्र मानै कहा लुगाई ना,
टोटे मै घरबारी दुखिया और रोजगार कमाई ना,
भरै तवाई सहम गात होज्या बहम दवाई ना,
बिकट तमाशा घरवासा माणस की जेल रहे जा सै।।

त्रिया रूप मोहनी माया शिवशंकर भी नचा दिया,
नारद नै ब्याह की सोची बांदर का फोटू खिचां दिया,
कहै राजेराम फंसा माया मै भगत हरि नै बचा दिया,
तु बुढ़ा जवान सुकन्या ब्याह किस तरिया जचां दिया,
बुढे़ बारै ब्याह करवाले न्यू धक्का पेल रहे जा सै।।

  रागणी:- 17
वार्ता:-
सज्जनों | अश्वनी कुमारों की बात सुनके चमन ऋषि कहते है कि त्रिया के बिना तो सब कुछ अधुरा है क्यूकि हर चीज का आधार ही औरत है द्य इसी से सृष्टि रची और इसी से वंश बेल बढती हैद्य इसलिए जो सबसे बड़ा आश्रम गृहस्थ आश्रम जिससे सब कुछ आगे बढ़ता और जिस आश्रम के बिना स्रष्टि की कल्पना ही नही की जा सकती उसी आश्रम की धुरी भी एक त्रिया ही है द्य इस प्रकार चमन ऋषि अश्वनी कुमारो को औरत के बारे मे समझाते हुए क्या कहते है |

जवाब:- चमन ऋषि का

जग जननी जगदम्बे शक्ति का अवतार लुगाई सै,
चालै वंश बैल माणस की ताबेदार लुगाई सै। ।टेक।

प्रथम रच्या आकाश हरि नै पाछै रवि राकेश होए,
11 रूद्र रचे क्रोध से प्रकट शेष महेश होए,
ब्रहमा नै शतरूपा रचदी स्वयंम्भू मनू नरेश होए,
कार कंश कक्षुआ भारत वर्त आर्य देश होए,
प्रकट काल कलेश होए यो जगत का सार लुगाई सै।।

शिवशंकर का साथ निभावै हिमाचल की पार्वती,
विष्णु जी का साथ निभावै के नहीं लक्ष्मी नार सती,
जगत रचावै साथ निभावै ब्रह्मा जी की ब्रहमवती,
इन्द्र गैल्या इन्द्राणी कामदेव संग नार रती,
गंगा जमना सरस्वती ये तीनों धार लुगाई सै।।

ईच्छाधारी रूप बणाके माया जीव भलोणी सै,
माया ब्रहम का मेल जगत मै प्रकृति मन मोहणी सै,
सुर्यदेव की छाया पत्नी चंद्रमा की रोहणी सै,
काल की पत्नी का नाम कल्पना लाख चैरासी योनी सै,
बेदवती भेमाता होणी भूमि चार लुगाई सै।।

जगजननी और जगतपिता नै रचदी जगत जेल माया,
गृहस्थ आश्रम पति-पत्नी का पुत्र अगत बेल माया,
बहु पूरजंनी जीव पूरजंन ब्रहम से करै मेल माया,
राजेराम कमावै दुनिया चालै नहीं गैल माया,
आत्मरूप खेल माया सबका परिवार लुगाई सै।।

  रागणी:- 20

वार्ता – सज्जनों जब सुकन्या की बात सुनके फिर अश्वनी कुमार दोबारा क्या कहते है |

जवाब:- अश्विनी कुमारो का।

धुर की सैर कराऊं बैठ कै चालै तो म्हारे विमान मै,
फिरै एकली सुकन्या क्यूं जंगल बीयाबान मै।। टेक।

सुमेरूं कैलाश देखिए जड़ै शिवजी पार्वती सै,
सुमेरूं तै काग भूसण्डी योगी परमगति सै,
राहु केतु शनि पास मै शुक्र-बृहस्पति सै,
आठ वसु नौ ग्रह देवता दस दिगपाल गति सै,
सप्त ऋषि त्रिशकुं दिखै ध्रुव भगत आसमान मै।।

56 हजार लाख योजन पृथ्वी से चांद बताया,
चंद्रमा से तीन लाख योजन सूर्य कहलाया,
सूर्य से 13 लाख योजन ध्रुव लोक परमपद पाया,
1700 योजन परमलोक ब्रहमा नै जगत रचाया,
असमान का अंत फेर भी लिखा नहीं प्रमाण मै।।

पूर्व दिशा मै स्वर्गपुरी न्यूं संत सुजान कहै सै,
दक्षिण दिशा मै यमलोक जगत जहान कहै सै,
पश्चिम दिशा मै वरूण देव बिलोचीस्तान कहै सै,
उतर दिशा मै चंद्रलोक सै बेद पुराण कहै सै,
सुर्य खड़या पृथ्वी घूमै लिख्या लेख विज्ञान नै।।

इंद्रलोक स्वर्गपुरी 15 सौ योजन का राह सै,
रास्ते मैं तपै 12 सूर्य ताती तेज हवा सै,
लाख चैरासी जियाजुन का धर्मराज घर न्या सै,
पूण्य और पाप तुलै नरजे मै वा सच्ची दरगाह सै,
राजेराम पार होज्यागा ला सुरती भगवान मै।।

Author
लोककवि व लोकगायक पं. राजेराम भारद्वाज संगीताचार्य @ संकलनकर्ता - सन्दीप कौशिक, लोहारी जाटू, भिवानी - हरियाणा |
संकलनकर्ता :- संदीप शर्मा ( जाटू लोहारी, बवानी खेड़ा, भिवानी-हरियाणा ) सम्पर्क न.:- +91-8818000892 / 7096100892 रचनाकार - लोककवि व लोकगायक पंडित राजेराम भारद्वाज संगीताचार्य जो सूर्यकवि श्री पंडित लख्मीचंद जी प्रणाली से शिष्य पंडित मांगेराम जी के शिष्य जो... Read more
Recommended Posts
किस्सा / सांग - # चमन ऋषि - सुकन्या  #
किस्सा / सांग - # चमन ऋषि - सुकन्या # भजन.1 ब्रहमा बैठे फूल कमल पै सोचण लागे मन के म्हां, आई आवाज समुन्द्र मै... Read more
# सम्पूर्ण सांग :- चमन ऋषि - सुकन्या  #
सांग :- चमन ऋषि - सुकन्या | वार्ता:- सज्जनों! जब पाण्डवों को वनवास मिला हुआ था उस समय पांचों पाण्डव और साथ में द्रौपदी रानी... Read more
किस्सा / सांग - # चमन ऋषि - सुकन्या  # टेक - 28 गोत ब्राहम्ण सारे ध्यान उरै नै करणा सै, गृहस्थ आश्रम पति पत्नी का धर्म सनातन बरणा सै।।टेक।
किस्सा / सांग - # चमन ऋषि - सुकन्या # 28 गोत ब्राहम्ण सारे ध्यान उरै नै करणा सै, गृहस्थ आश्रम पति पत्नी का धर्म... Read more
बना कुंच से कोंच,रेल-पथ विश्रामालय||
विश्रामालय रेल का कुंच पड़ गया नाम| गोरों-शासन बाद तक ऋषि को किया प्रणाम|| ऋषि को किया प्रणाम कुंच स्टेशन भाया| संशोधित पुनि नाम कुंच... Read more