Jun 11, 2021 · कविता
Reading time: 1 minute

किस्मत की निठुराई….

किस्मत की निठुराई…

पलभर पाया साथ खुशी का
अब लम्बी तन्हाई
हँसता मुखड़ा नहीं सुहाए
किस्मत की निठुराई

बाहर शांत मगर मन भीतर
चलती थी फेंटेसी
छाया बढ़कर मुझ तक आयी
लगी तुम्हारी जैसी

चित्रलिखित-सी तकती उसे मैं
लाज भरी सकुचाई

नन्ही खुशी भी टिक न पाती
साये गम के बढ़ते
नसीब ठूँठ-सा पाकर, ख्वाब
कल्पद्रुम के गढ़ते
कलम विरंचि की आज हमसे
आँख मिला शरमाई

नियति-शकुनि ने फेंके पासे
खेले खेल कपट के
पटकी देकर खूब छकाया
देखा नहीं पलट के
भर-भर अंधड़ चले गमों के
आस-कली मुरझाई

हर ऋतु हर मौसम से हमने
दुखड़ा अपना रोया
अपने ही अश्कों से फिर-फिर
मुखड़ा अपना धोया
किस्मत के मारों की जग में
होती कब सुनवाई

पलभर पाया साथ खुशी का
अब लम्बी तन्हाई…..

– सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र )
“मनके मेरे मन के” से

2 Likes · 16 Views
Copy link to share
डॉ.सीमा अग्रवाल
60 Posts · 1.9k Views
Follow 3 Followers
You may also like: