कविता · Reading time: 1 minute

किस्मत का खेल

देख तमाशा किस्मत का
कैसा कैसा खेल दिखाये
कुछ को देखो सब दे जाये
कुछ के कुछ हाथ ना आये
खेलने कूदने की उम्र में वो
देखो पैसे कमाने जाये
नही कोसती दुनिया को
ना वो किसी को,
अब नज़र ही आये
दो रोटी को लाले घर में
खेलने को खिलौने कहाँ से पाये
देख उन्हें इस हालत में अब
खुद पे खूब तरस है आये
होते हुये सब अपने पास
फिर भी भगवान को
खूब कोसते जाये
ऐसी असमानता ना हो कंही पर
जिसमे कोई खूब खाये,
कंही कोई भूखा सो जाये।।

®आकिब जावेद

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मेरा नाम आकिब जावेद है| पिता - श्री मो.लतीफ़ , माता- श्रीमती नूरजहां | मैं एक छोटे से क़स्बे बिसंडा जिला बाँदा (उत्तर प्रदेश) का निवासी हूँ| जन्मतिथि- 06-02-1993, शिक्षा-…
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