कविता · Reading time: 1 minute

किसी का सदा बोलबाला कहाँ है

तंगी मे काटे है जीवन सदा ही
गरीबों को मिलता निवाला कहाँ है ।
करते क्यो अभिमान धन पर अपने
किसी का सदा बोलबाला कहाँ है ।
बदलते गए सच के मायने अब
कई कारनामे अब काला कहाँ है ।
अच्छे आचरण की सोचे भी कैसे
बच्चों को परवरिश में पाला कहाँ है ।
कुछ भी कह दे तुम्हें कोई पता नही
लोगों की जुबां पर ताला कहाँ है ।
कांटे बन चुभती ही गरीबी
कोई हल अभी तक निकाला कहाँ है ।
मदद करें कोई वृद्ध बीमारो को
ऐसा मानव निराला कहाँ है ।
जमी सोना बिछौना है इनका
पास महल दुमाला कहाँ है ।
विन्ध्यप्रकाश मिश्र विप्र

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