किसान

“हरिया! आजकल खेत में नहीं दिखते हो? कोई दूसरा काम मिल गया क्या?” रास्ते से जाते हुए बिचौलिये ,नत्थू सिंह ने पूछा । “मालिक क्या बताऊँ? लुगाई की तबीयत बहुत खराब है, 10 दिन से अस्पताल की भागदौड़ में ही लगा हुआ हूँ “
” क्या हो गया रे तेरी जोरू को ?” नत्थू सिंह ने अधीरता से पूछा । “इ डाक्टर लोग बोलत हैं नुमोनिया हो गया है” हरिया ने जवाब दिया । “उसको निमोनिया कहते हैं “। “हाँ ! उही हुआ है”।
“देखो न मालिक 35000 जमा करने बोल रहा है, नै तो इलाज नै करेगा …कहाँ से लायेंगे हम एतना पैसा ?”
“मालिक थोड़ा मदद कर दो न ….हम कुछ भी कर के चुका देंगे “
“पैसा पेड़ पर नहीं उगता है हरिया!” “मेहनत करना पड़ता है” कहते हुए फोन कान पर लगाकर नत्थू सिंह आगे बढ़ गया।
हरिया बहुत गरीब किसान था । उसके पास कुछ नहीं था सिवाय एक कुटिया और पत्नी के । एक छोटा सा खेत वह अपनी माँ के इलाज के लिए 5 वर्ष पहले ही बेच चुका था पर माँ फिर भी नहीं बची । दूसरों के खेत में मजदूरी करके गुजारा करने वाले हरिया के पास खोने के लिखने अपनी पत्नी के सिवाय कुछ नहीं था।
हरिया सप्पन सिंह के घर पहुँचा , जो बहुत बड़ा जमींदार था।”साहब कुछ पैसे दे दो साब ; लुगाई का इलाज करवाना है साब नहीं तो मर जायेगी, मैं कैसे भी आपके पैसे लौटा दूँगा साब!” हरिया गिड़गिड़ाने लगा । “ऐ मलिकिनी सुनती हो ! हरिया पैसे माँग रहा है और कह रहा है कि बाद में लौटा देगा…” और कहते कहते जोर से अट्टहास करने लगा। हरिया को यहाँ से भी खाली हाथ लौटना पड़ा ।
इसी तरह हरिया पैसों के लिए भटकता रहा । अधिकतर जगह उसे मिली तो लेकिन उलाहना मिली । हरिया के गिड़गिड़ाने से कुछ लोगों को दिल पसीजा तो कुछ पैसे दे दिये नहीं तो नत्थू सिंह और सप्पन सिंह जैसे लोग ही मिले। पर हरिया अपने एक मात्र सहारे के लिए कुछ भी करने को तैयार था।
जैसे तैसे कुछ पैसे इकट्ठा कर के हरिया हाँफता हुआ अस्पताल पहुँचा ।
“डाक्टर साब हम ले आए “
“सॉरी हरिया तुम लेट हो गये तुम्हारी पत्नी अब नहीं रही” डाक्टर ने सर झुकाते हुए कहा और वहाँ से चला गया।
हरिया अपनी पत्नी की लाश के पास पहुँचा ।वह दहाड़ मार कर रोना चाह रहा था पर आँसू ही नहीं आ रहे थे।

जो पैसे हरिया ने इकट्ठा किये थे उससे ही अपनी पत्नी का अंतिम संस्कार किया । अब वह बिल्कुल नि:सहाय था । कुछ सोचते हुए वह गाँव के ही नदी पर बने पुल पर पहुँचा और वहाँ बैठ गया। नदी के किनारों को देखकर उसे बचपन के दिन याद आ गये जब वह तैरकर इस किनारे से उस किनारे तक पहुँच जाता था और अचानक से उसने छलांग लगा दी। वह नदी की गहराइयों में जाता जा रहा था। वह तैर कर उपर आ सकता था पर वह चाहता नहीं था। वातावरण बिल्कुल शांत था सिर्फ कुछ देर तक डुबकियों की आवाज आई। कुटिलता से मुस्कुराते हुए काले बादल ढलते हुए सूरज और उसकी लालिमा को ढकने लगे थे। एक और किसान मजबूरियों के आगे दम तोड़ चुका था …………

©आयुष कश्यप
फारबिसगंज

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साहित्य का दीवाना....लघुकथा, कविता, ग़ज़ल में विशेष रूचि.....
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