किसान

:दर-दर ठोकर खा रहा, है लाचार किसान।
शासन प्रकृति से सदा,मिला उसे दुख दान।।

जितनी सरकारें बनी, किया नहीं कुछ काम।
दिखलाया सपने हमें,मृग मरीचिका नाम।।

मायूसी छाया रहा, मुख पर दिन रात।
सरकारें सुनती नहीं, उस गरीब की बात।।

युग बदला,बदला नहीं, किसान की तकदीर।
बेघर,भूखा मर रहा,आँसूँ ही जागीर।।

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